मां की आखिरी सीख दे गई जीने का मकसद, रोटी बैंक से दे रहीं दूसरों को नया जीवन


21वीं सदी में भारत भले ही चांद पर पहुंच चुका हो लेकिन आज भी देश की एक बड़ी आबादी ऐसी है जो भूखे पेट रात गुजारने को मजबूर है। ऐसे में आम जनता में से कुछ ऐसे हीरोज सामने आते हैं जो इन जरूरतमंदों के लिए हर कदम पर तैयार रहते हैं। ऐसे ही कुछ हीरोज के हरदोई जिले में चला रहे हैं। कोई भी अपना भूखा न सोए, इस सपने को लेकर युवाओं की यह टोली दिन-रात जुटी रहती है। मूलरूप से केरल की रहने वाली ग्लेस ऐंटनी इस बैंक का एक अहम हिस्सा हैं। वह दूसरों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं।

रोटी बैंक की स्थापना 2017 में समाजसेवी अरुणेश पाठक ने की थी। उन्होंने जब ग्लेस से इससे जुड़ने के लिए पूछा तो उन्होंने फौरन हां कर दी, न का तो सवाल ही नहीं था। उसके बाद शुरू हुआ सिलसिला जो आज तक जारी है। शहर के एक कंप्यूटर सेंटर पर हर हफ्ते शनिवार की शाम लोगों के घरों से रोटियां इकट्ठा की जाती हैं। रोटियां अगर कम पड़ जाती हैं तो बनवाई जाती हैं। इसके बाद 150 पैकेट तैयार किए जाते हैं जिनमें 4 रोटियां, सब्जी, मिर्च, गुड़ वगैरह होता है।

लोगों को दी जाती है जानकारी
बैंक से बड़ी संख्या में जुड़े युवा पहले हरदोई और आसपास के गांवों में ऐसे इलाके ढूंढते हैं, जहां मदद की जरूरत हो। इसके बाद ये युवा घर-घर जाकर रोटी बांटते हैं। ग्लेस बताती हैं कि बैंक ने ऐसे घरों तक मदद पहुंचाई है जिनके घरों में छतें तक नहीं होतीं। ऐसे हालात में रह रहे लोगों के लिए बैंक किसी वरदान से कम नहीं होता। किसी एक जगह कैंप का आयोजन होने पर कई बार पहले कार्ड और पर्चे भी बांटे जाते हैं जिससे लोगों को पता चल सके कि कब और कहां आना है।

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50 रोटियों का खर्च देती हैं ग्लेस
दिवाली जैसे त्योहारों पर खाना, मिठाई आदि दिया जाता है तो सर्दियों में रजाई और कंबल। हाल ही में शहर में बैंक ने 150 रजाई और 50 कंबल बांटे। ग्लेस का कहना है कि भले ही यह ज्यादा बड़ा योगदान न हो लेकिन कम से कम थोड़ा ही सही, कुछ तो है। बैंक से 500 से ज्यादा लोग जुड़ चुके हैं जो इन सब कामों के लिए फंड इकट्ठा करते हैं। बिना किसी सरकारी मदद, सिर्फ लोगों के योगदान से फंड इकट्ठा होता है जिससे जरूरी सामान खरीदा जाता है। ग्लेस अपनी ओर से 50 रोटियों का खर्च जरूर देती हैं।

‘कम पड़ने पर बनवाई जाती हैं रोटियां’बैंक भले ही समाज सेवा के मकसद से आगे आया हो, शुरुआत में लोगों को इस काम पर विश्वास नहीं होता था। उन्हें शक होता था कि पता नहीं कैसा खाना होता है, क्या है। हालांकि, धीरे-धीरे विश्वास बढ़ता गया और दायरा भी। रोटियां आम लोग डोनेट करते हैं और कम पड़ने पर बनवाई जाती हैं जबकि सब्जी एक ही जगह ताजी बनती है और फिर गरीबों को घर-घर जाकर, अस्पतालों में बांटी जाती है। आज शहर में बैंक की पहचान भी है और भरोसा भी। इससे जुड़ने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है और लोग अपने हिसाब से योगदान भी देते हैं।

ऐसे मिली इस कार्य की प्रेरणा
ग्लेस के पैरंट्स हमेशा चैरिटी के काम से जुड़े रहे। उनका परिवार दो अनाथालयों को सपॉर्ट किया करता था। उनके पिता जर्मनी में सेटल हो गए हैं लेकिन अनाथालयों को सपॉर्ट अब भी जारी है। ग्लेस बताती हैं कि उनकी मां को कैंसर था। उनके अंतिम दिनों में ग्लेस और उनके भाई ने मजाक में मां से कहा कि उनके लिए वे अखबार में बड़ा सा कॉलम छपवाएंगे तो मां ने उन्हें सीख दी कि ऐसा करने की जगह वे किसी गरीब को खाना खिलाएं। मां की वह सीख आज भी ग्लेस के साथ है और वह हर तरह से लोगों की मदद को आगे रहती हैं।

…और हरदोई में बस गईं ग्लेसहरदोई के एक पब्लिक स्कूल में टीचर ग्लेस पहले बैंगलोर मेडिकल कॉलेज में नौकरी करती थीं। शादी के बाद पति के साथ वह हरदोई में बस गईं। उनकी नौकरी नई दिल्ली के एम्स में भी लगी लेकिन दो छोटे बच्चों की परवरिश के लिए उन्होंने हरदोई को अपना बना लिया। ग्लेस कहती हैं कि कभी-कभी लगता है कि पता नहीं सब कैसे हुआ लेकिन अब बहुत खुशी होती है।

केरल में भी है एक टीम
ग्लेस सिर्फ हरदोई नहीं, केरल के कुन्नूर में स्थित अपने घर भी जाती हैं तो वहां भी इसी काम को आगे बढ़ाती हैं। वहां भी एक टीम है जिसके साथ वह ओल्ड एज होम और अनाथालयों में जाती हैं। उनके दोनों बेटे और बच्चों के दोस्त भी उन्हें देखकर प्रेरित होते हैं और अपनी ओर से मदद करते हैं। ग्लेस कहती हैं कि जब इसके काम को देखकर दूसरे भी मदद को आगे आते हैं, तो देखकर बहुत शांति मिलती है।

Source: International

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