किरंदुल में अवैध अतिक्रमण का खुला खेल: वार्ड नंबर 6 की गलियां बंद, नगरपालिका की नाकामी उजागर

किरंदुल (छत्तीसगढ़), छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित किरंदुल शहर के वार्ड नंबर 6 में अवैध अतिक्रमण ने आम नागरिकों का जीना दूभर कर दिया है। गलियों और रास्तों पर कब्जा जमाने का यह खेल इतना बेखौफ हो चुका है कि सरकारी संपत्ति तक को निगल लिया जा रहा है। स्थानीय निवासियों की शिकायतों के बावजूद किरंदुल नगरपालिका की सुस्ती और लापरवाही साफ नजर आ रही है, मानो अधिकारियों ने आंखों पर पट्टी बांध रखी हो। इस स्थिति ने न केवल यातायात और जल निकासी को प्रभावित किया है, बल्कि शहर की मूल संरचना को ही खतरे में डाल दिया है।

वार्ड नंबर 6 के घड़ी चौक से शुरू होने वाला गौरव पथ, जो कभी शहर की शान हुआ करता था, अब पूरी तरह से व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की भेंट चढ़ चुका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां दुकानदारों और व्यापारियों ने बिना किसी डर के सड़कें और फुटपाथ घेर लिए हैं। एक प्रमुख उदाहरण शिव शर्मा का है, जिन्होंने बस स्टैंड के सामने वाली गली को पूरी तरह से ब्लॉक कर दिया है। नगरपालिका द्वारा निर्मित नाली के ऊपर दीवार खड़ी करके रास्ता बंद कर दिया गया है, जिससे जल निकासी की समस्या और बढ़ गई है। बारिश के मौसम में यहां पानी भर जाता है, जो मच्छरों और बीमारियों का घर बन जाता है। निवासियों का आरोप है कि यह अतिक्रमण न केवल अवैध है, बल्कि नगरपालिका की मिलीभगत से पनप रहा है।

अतिक्रमण की जड़ें: क्यों नहीं रुक रहा यह खेल?

विश्लेषण करने पर पता चलता है कि किरंदुल जैसे छोटे शहरों में प्रशासनिक ढिलाई एक बड़ी समस्या है। नगरपालिका के अधिकारियों की निष्क्रियता से अतिक्रमणकारियों के हौसले बुलंद हैं। स्थानीय स्रोतों के अनुसार, वार्ड नंबर 6 में सरकारी भूमि पर कब्जे की घटनाएं पिछले कुछ वर्षों से बढ़ रही हैं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। क्या वजह है कि शिकायतों के बावजूद नोटिस जारी नहीं होते या अतिक्रमण हटाने के अभियान नहीं चलाए जाते? जानकारों का मानना है कि इसमें राजनीतिक दबाव या भ्रष्टाचार की भूमिका हो सकती है। एक निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “अधिकारी जानते हैं, लेकिन कार्रवाई करने से डरते हैं। लगता है जैसे अतिक्रमणकारियों को पूरी छूट मिली हुई है।”

इस समस्या का असर आम जनता पर पड़ रहा है। गलियां बंद होने से पैदल चलना मुश्किल हो गया है, वाहनों की आवाजाही प्रभावित है, और आपातकालीन सेवाएं जैसे एंबुलेंस या फायर ब्रिगेड पहुंचने में देरी हो सकती है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए तो यह और भी खतरनाक है। शहर की बढ़ती आबादी के बीच ऐसी लापरवाही न केवल विकास को रोक रही है, बल्कि कानून-व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर रही है।

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