
किरंदुल,नीलगिरी पार्क, किरंदुल बैलाडीला (जिला दंतेवाड़ा) में होली का उत्सव इस वर्ष केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि साहित्य, संस्कृति और सामाजिक सौहार्द का अनुपम संगम बनकर सामने आया। हर ओर गुलाल की सतरंगी आभा, ढोलक की मधुर थाप और आपसी आत्मीयता का आलोक वातावरण को आल्हादित कर रहा था। प्रकृति की हरियाली के मध्य आयोजित इस उत्सव ने मानो रंगों को शब्द और शब्दों को संवेदना प्रदान कर दी।
कार्यक्रम में वरिष्ठ शिक्षाविद् एवं साहित्यप्रेमी कृष्ण वल्लभ आचार्य सर ने होली के सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पर्व केवल उल्लास का प्रतीक नहीं, बल्कि मन के मैल को धोकर प्रेम, करुणा और समरसता का संदेश देने का अवसर है। उनके ओजस्वी विचारों ने उपस्थित जनसमूह को गहन चिंतन की दिशा दी।
अशोक ठाकुर सर ने लोक परंपराओं और ग्रामीण संस्कृति में होली की भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया कि यह पर्व पीढ़ियों के बीच संवाद का सेतु है। वहीं गवाड़े सर ने सामूहिक सहभागिता को समाज की शक्ति बताते हुए सभी को सामाजिक एकता का संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया।
पार्षद लीना सोनी ने अपने संबोधन में क्षेत्र की सांस्कृतिक चेतना को जीवंत बनाए रखने के लिए ऐसे आयोजनों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि रंगों की यह उमंग समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
कार्यक्रम में के. कोर्रम सर तथा आर. पी. उपाध्याय सर की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को और भी गौरवमय बना दिया। दोनों विद्वानों ने साहित्यिक काव्य-पाठ एवं प्रेरक उद्बोधन के माध्यम से होली के आध्यात्मिक और सामाजिक आयामों को विस्तार दिया।
अंत में सामूहिक रंग-अभिषेक, फाग गीतों और पारंपरिक व्यंजनों के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ। नीलगिरी पार्क का यह होली उत्सव न केवल रंगों की बौछार था, बल्कि सांस्कृतिक समृद्धि, साहित्यिक सौंदर्य और मानवीय एकता का सजीव उत्सव बनकर स्मृतियों में अंकित हो