
नैशनल डेमोक्रेटिक अलायंस () में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है, यह बात अब अलायंस के नेता भी खुल के बोलने लगे हैं। महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर रार के बाद सबसे पुराने सहयोगी शिवसेना ने बीजेपी से गठबंधन तोड़ दिया और आज हुई गठबंधन की बैठक में शामिल नहीं हुई। बैठक के बाद लोक जनशक्ति पार्टी के नव नियुक्त प्रमुख ने कहा कि गठबंधन को बनाए रखने के लिए एक संयोजक की जरूरत है।
चिराग पासवान ने कहा कि गठबंधन के सहयोगी दलों के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए और इस काम के लिए NDA को एक संयोजक नियुक्त करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पहले तेलुगू देशम पार्टी (TDP) ने एनडीए का साथ छोड़, बाद में उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) एनडीए से अलग हुई। 2018 के अंत में लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे में उपेक्षा का आरोप लगाकर उपेन्द्र कुशवाहा ने गठबंधन का साथ छोड़ दिया था। उससे पहले मार्च 2018 में आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा की मांग पूरी नहीं होने पर TDP ने NDA का साथ छोड़ दिया था।
बिहार में भले ही बीजेपी और नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू साथ हो, लेकिन मनमुटाव की खबरें आती रहती हैं। लोकसभा चुनाव 2019 के बाद जेडीयू को मोदी कैबिनेट में एक मंत्री का कोटा मिला जिसे नीतीश कुमार ने लेने से इनकार कर दिया और गठबंधन में सहयोगी बने रहने का फैसला लिया।
वाजपेयी के जमाने में भी होता था संयोजक का पद
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने से ही NDA में सहयोगी दलों के बीच तालमेल बिठाने के लिए संयोजक का पोस्ट हुआ करता था। शरद यादव और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे नेता सालों तक इस पद पर बने रहे। 2013 में जब जेडीयू गठबंधन से अलग हुई तो शरद यादव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद से एनडीए में संयोजक का पद खाली था।
2013 के बाद बदल गई NDA की स्थिति
2014 में नरेंद्र मोदी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो सहयोगी दलों का कहना था कि खुद प्रधानमंत्री मोदी संसद के हर सत्र में NDA की बैठक की अगुवाई करते हैं और गठबंधन की शिकायतों को सुलझाने जैसे काम अमित शाह करते हैं।
(इनपुट पीटीआई के साथ)
Source: National