पानी की हर बूंद बचाने की कला सिखा रहे डॉ. अमित

BShyam.Vir

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ग्रेटर नोएडा: Bकहा जाता है कि पानी की हर बूंद कीमती है, लेकिन ग्रेटर नोएडा में रहने वाले डॉ. अमित मिश्रा से यह सीखा जा सकता है कि ये बूंद कितनी कीमती है। डॉ. अमित मिश्रा पानी की हर बूंद को 2-2 बार इस्तेमाल कर रहे हैं। शहर में अभी पानी की किल्लत नहीं है, फिर भी वह बरसात के पानी और फर्श की धुलाई में प्रयोग हुए पानी तक को स्टोर कर उसका इस्तेमाल करते हैं। उनके आरओ से वेस्ट हुआ पानी भी नाली में नहीं बहता, बल्कि उससे बर्तन धुलवाए जाते हैं। इसके अलावा जल और पर्यावरण को बचाने के लिए वह पसंद नामक संस्था के साथ मिलकर नुक्कड़ नाटकों के जरिए स्कूल, कॉलेजों, मार्केट व कंपनियों में लोगों को जागरूक भी करते हैं।

डॉ. अमित मिश्रा शहर के सेक्टर अल्फा-2 स्थित जी-3 मकान में परिवार के साथ रह रहे हैं। वह एक कंपनी में सीनियर एडवाइजर हैं। फर्श की धुलाई और बरसात के पानी के नाले में बह जाने से वे दुखी होते थे। लिहाजा उन्होंने अपने घर के बाहर पानी स्टोर करने के लिए खास सिस्टम बनाया है। मकान के रैंप में उन्होंने एक छोटी सी नाली बनाई है, जिसमें फर्श की धुलाई और बरसात का पानी बहकर पहुंचता है। ये पानी पहले एक छोटे पिट में पहुंचता है। गंदगी को रोकने के लिए पिट के बाहर जाली लगाई है। पानी की मिट्टी पिट में एकत्र हो जाती है और पानी इसके बाद जमीन में गाड़े गए एक टैंक में पहुंच जाता है। 300 लीटर क्षमता का प्लास्टिक के इस टैंक में हाथ से चलने वाला पंप फिट किया गया है। इस पंप को हाथ से चलाकर वह अपने व पड़ोसियों के पौधों में पानी देते हैं। साथ ही बाल्टी में इसको भरकर गाड़ी धोने में भी प्रयोग किया जाता है। इसे लगाने में मात्र 2 हजार रुपये का खर्च आया है। इस सिस्टम को उन्होंने ड्रिंक एंड वोमेट टैंक नाम दिया है।

B4 लीटर आरओ के पानी में 12 लीटर होता है बर्बाद

Bडॉ. अमित ने अपने किचन में लगे आरओ के वेस्ट पानी को फिर से प्रयोग करने के लिए एक खास पॉलीबैग लगाया है। इसमें पानी स्टोर होता है और इसी से एक पाइप कनेक्ट कर बर्तन धोने के लिए अलग नल लगाया गया है। उनका कहना है कि आरओ से चार लीटर पानी लेने में 12 लीटर पानी बर्बाद होता है। इसे उन्होंने एक्वा पॉलिस बूंद-बूंद कर रक्षक नाम दिया है। उनका कहना है कि इस सिस्टम को वह जल्द ही मार्केट में भी उपलब्ध कराएंगे।

Bघर पर ही बनाते हैं खादB

कटी हुई सब्जी के वेस्ट से वे खाद भी बनाते हैं। इसके लिए उन्होंने एक कंपोस्टर इको बिन लगाया है। इसमें सब्जी के वेस्ट को डालते हैं। यह 15 से 20 दिन में भर जाता है। एक माह में खाद तैयार हो जाता है, जिसे पौधों में लगाया जाता है। डॉ. अमित ने एक चक्की भी डिजाइन की है, जिसे पैरों से चलाया जाता है। जिम में बिजली की मशीन पर साइकलिंग की एक्सरसाइज करने के बजाय इस पर बिना बिजली खर्च किए आटा पीसा जाता सकता है।

Source: International

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